मिडिल ईस्ट में जंग की आग: ईरान का मिसाइल तूफान, होर्मुज संकट से दुनिया दहली

हुसैन अफसर
हुसैन अफसर

पश्चिम एशिया का आसमान इन दिनों सिर्फ बादलों से नहीं, बल्कि बारूद से भरा हुआ है. एक तरफ बंकर-भेदी बम जमीन के भीतर गूंज रहे हैं, दूसरी तरफ आसमान में मिसाइलों और ड्रोन की परछाइयां तैर रही हैं.

28 फरवरी को जब अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया, तो यह सिर्फ एक हमला नहीं था. यह उस चिंगारी का विस्फोट था जिसने पूरे मिडिल ईस्ट को युद्ध की भट्टी में धकेल दिया.

हमले के दौरान ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei की मौत की खबर ने पूरे क्षेत्र में भूचाल ला दिया. इसके बाद से घटनाएं इतनी तेजी से बदलीं कि हर दिन जंग का नया अध्याय लिख रहा है.

ऑपरेशन से शुरू हुई जंग की पहली लपट

28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने ईरान के सैन्य ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हमला शुरू किया. इस ऑपरेशन में कई अहम सैन्य अड्डे और मिसाइल प्रतिष्ठान निशाने पर रहे. हमले का मकसद ईरान की सैन्य क्षमता को अचानक झटका देना था. लेकिन परिणाम उल्टा भी निकला. तेहरान ने तुरंत जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी.

ईरान का पलटवार: मिसाइल और ड्रोन की बारिश

हमले के बाद ईरान की सैन्य शाखा Islamic Revolutionary Guard Corps ने इजरायल और खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर सैकड़ों मिसाइलें और ड्रोन दागे. 2 मार्च को स्थिति और भड़क गई जब लेबनान के संगठन Hezbollah ने उत्तरी इजरायल पर हमला कर दिया.

इसके बाद इजरायल ने लेबनान के कई इलाकों पर भारी बमबारी शुरू कर दी. इसने पूरे क्षेत्र को एक व्यापक युद्ध की ओर धकेल दिया.

होर्मुज जलडमरूमध्य: दुनिया की सांस अटकी

4 मार्च के बाद वैश्विक बाजार में घबराहट तब बढ़ी जब ईरान ने Strait of Hormuz को बंद करने की धमकी दी. यह वही समुद्री रास्ता है जहां से दुनिया के तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है. तेल कंपनियों और ऊर्जा बाजार में तुरंत हलचल मच गई. तेल की कीमतों में तेजी आई और कई देशों को ऊर्जा संकट का डर सताने लगा.

बंकर बमों की बरसात और ‘डेथ वैली’

6 मार्च के बाद युद्ध और खतरनाक हो गया. अमेरिका ने ईरान के भूमिगत मिसाइल अड्डों को निशाना बनाते हुए 2000 पाउंड के बंकर-भेदी बम गिराने शुरू किए. इसके जवाब में ईरान ने होर्मुज के समुद्री रास्तों में बारूदी सुरंगें बिछा दीं. अब विश्लेषक इस क्षेत्र को “डेथ वैली” कहने लगे हैं.

इसका मतलब साफ है. अगर यहां कोई टकराव हुआ तो वैश्विक ऊर्जा सप्लाई पर सीधा असर पड़ेगा.

छात्रों से लेकर बाजार तक संकट

युद्ध का असर सिर्फ सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं है.

इजरायल के छात्र संगठनों ने कहा है कि लगातार हमलों और आपातकालीन हालात की वजह से पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हुई है. कई देशों ने अपने नागरिकों को सुरक्षित निकालने के लिए एडवाइजरी जारी कर दी है. भारत सहित कई देशों ने भी अपने नागरिकों से सतर्क रहने की अपील की है.

11 मार्च तक स्थिति बेहद तनावपूर्ण बनी हुई है. अमेरिका ईरान के परमाणु ठिकानों को नष्ट करने के लिए जमीनी कार्रवाई पर विचार कर रहा है. दूसरी तरफ तेहरान भी सैन्य तैयारियों में पीछे हटने के संकेत नहीं दे रहा.

इस समय दुनिया एक खतरनाक मोड़ पर खड़ी है. अगर कूटनीति ने रास्ता नहीं निकाला, तो यह युद्ध सिर्फ मिडिल ईस्ट की सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगा. इसकी लपटें वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार तक पहुंच सकती हैं.

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